नितिन गडकरी को पता थी बोर्ड से निकाले जाने की बात, पहले भी गंवा चुके हैं कई बड़े पद

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को संसदीय बोर्ड से बाहर कर दिया गया था। अब खबर है कि इस फैसले की जानकारी हफ्तों पहले ही लग गई थी। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब पार्टी में उनकी जिम्मेदारियां कम की गई हों। उनके साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी बोर्ड से हटा दिया गया था। पार्टी में हुए बड़े फेरबदल को लेकर सियासी गलियारों में जमकर चर्चाएं हुईं। क्योंकि इसमें दो दिग्गजों को न केवल बाहर किया गया, बल्कि देवेंद्र फडणवीस जैसे नए चेहरों को शामिल भी किया गया।

राजनीतिक जानकार पार्टी के इस कदम को गडकरी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बदलते समीकरणों से जोड़ रहे हैं। उनका कहना है कि भाजपा बगैर संघ परिवार को भरोसे में लिए यह फैसला नहीं ले सकती। अब नागपुर सांसद को भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का करीबी माना जाता है, लेकिन खबर है कि दत्तात्रेय होसाबले के सरकार्यवाह के तौर पर पद संभालने के बाद हालात बदले हैं।

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जानकारों का कहना है कि आज इस बात की संभावनाएं कम ही हैं कि आज गडकरी को हटाने के प्रस्ताव को संघ ठुकराएगा। कहा जा रहा है कि दत्तात्रेय के मुकाबले गडकरी के लिए भैयाजी जोशी का होना बेहतर होता। कारण इसे माना जा सकता है कि होसाबले अपना काम नागपुर लेकर नहीं गए। जबकि, जोशी सरकार्यवाह के तौर पर नागपुर में ही रहे।

पहली बार नहीं घटा कद!
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, नेताओं का कहना है कि गडकरी को पद से हटाने के फैसले के बारे में दो सप्ताह पहले ही जानकारी दे दी गई थी। खास बात है कि इससे पहले भी आयकर चोरी और वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के बाद उन्हें दूसरी बार भाजपा प्रमुख नहीं बनाया गया। साल 2019 में भाजपा नेता से शिपिंग एंड वॉटर रिसोर्सेज एंड रिवर डेवलपमेंट ले लिया गया। बाद में उन्हें MSME दिया गया, लेकिन वह भी नारायण राणे को सौंप दिया गया।

क्या युवाओं की टीम है वजह?
रिपोर्ट के अनुसार, नागपुर भाजपा के कुछ नेताओं का कहना है कि मोदी-शाह की जोड़ी भविष्य की टीम बना रही है, जो अगले दो दशकों तक पार्टी के लिए काम करे। ऐसे में सिंह और गडकरी जैसे वरिष्ठ सदस्यों को हटाना हैरानी भरा नहीं है। इसी वजह से फडणवीस और असम के पूर्व मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल को शामिल किया गया।

नेताओं का कहना है, ‘वे 65-80 आयुवर्ग के बजाए 50 और 65 के बीच के नेताओं पर फोकस कर रहे हैं। हम इसे स्वभाविक बदलाव के तौर पर देखते हैं। लालकृष्ण आडवाणी जैसे बड़े नेताओं को भी उम्र के चलते रिटायर होना पड़ा था। वह भविष्य के लिए तैयार करने के लिए युवा नेताओं को चुन रहे हैं।’

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