हिमालय को बचाने के लिए सबसे पहले हिमालय को समझना होगा। इसके लिए हिमालय इंटेलीजेंस को विकसित करने की आवश्यकता है। हिमालय में उन खरपतवारों और प्रजातियों की पहचान कर उनसे छुटकारा पाना होगा, जो वहां की वनस्पति और खेती पर कहर बरपा रही हैं। लैंटाना और गाजर घास या चीड़ के वनों से छुटकारा पाना होगा।
संवाद के मंथन से निकला पंचामृत
1. चीड़ हटाओ, बांज लाओ: संवाद में यह चिंता उभरी कि हिमालय क्षेत्र में चीड़ धरती को बंजर कर रहा है। बांज, देवदार, बुरांश, कैल सरीखी उपयोगी प्रजाति के वृक्षों के अस्तित्व के लिए वह संकट बना है। सरकार को चीड़ हटाओ, बांज-देवदार लाओ अभियान चलाना चाहिए। चीड़ वृक्षों को काटने की अनुमति हो और उनके स्थान पर चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों का जंगल उगाना चाहिए। चीड़ की लकड़ी का उपयोग उच्च हिमालयी क्षेत्रों में घर बनाने के लिए करना चाहिए।
2.घास को बनाएंगे खास: लैंटाना, गाजर घास हिमालय क्षेत्र में खेती को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। उत्तराखंड के जंगलों व राष्ट्रीय उद्यानों में यह तेजी से फैल रहा है। खेती और चारागाहों को बचाने के लिए लैंटाना और गाजर घास से मुक्ति दिलानी होगी। घास के नए मैदान विकसित करने हैं। जैविक खेती को बढ़ावा देना है।
4.लैब टू लैंड: देश-दुनिया के नामी संस्थान अपने-अपने क्षेत्रों में हिमालय के संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं, लेकिन ये काम अपने-अपने संस्थानों में सिमट कर रह जा रहे हैं। प्रयोगशाला में सीमित हो चुके इन कार्यों को जमीन पर उतारने की जरूरत है। लैब टू लैंड अभियान चलाने का समय आ चुका है।
5.पहाड़ की मिट्टी पहाड़ में: हिमालय से करोड़ों टन उपाजऊ मिट्टी कटाव हो रहा है। इसे रोकने की नीति बनानी है। पानी के संकट से उत्तराखंड में जो खेती महज आठ प्रतिशत तक सिमटी है, उसे सिंचाई के नए उपयोगी संसाधन से 40 फीसदी तक पहुंचाना है।
हिमालय दिवस से निकली आवाज का लिया जाने लगा संज्ञान: डॉ. अनिल जोशी
उन्होंने कहा कि इसका लाभ होता भी दिख रहा है। हमारी आवाज का नीतिकारों ने संज्ञान लिया है। उन्होंने कहा कि शुरुआत अच्छी हुई, लेकिन हिमालय के प्रति लोगों को अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। हिमालय उत्तराखंड ही नहीं देश की पारिस्थितिकी का भी केंद्र है। आज यूरोप के कई देशों में तापमान 40 से 45 डिग्री सेंटिग्रेट तक पहुंच गया है। हमारे यहां ऐसी स्थिति न हो, इस पर अभी से विचार करना होगा। जल, जंगल की जो संपदा हमारे पास है उसे संजो कर रखना होगा। उन्होंने कहा कि जब जल, जंगल बने थे तब हम नहीं थे। हमसे कहीं न कहीं प्रकृति के विज्ञान को समझने में चूक हुई है।
ईश्वर ने भी हिमालय को अपना निवास बनाया
हिमालय के संरक्षण के लिए जो भी बेहतर होगा, फैसला लेने में पीछे नहीं हटेंगे: सुबोध
बृहस्पतिवार को पटेलनगर स्थित अमर उजाला कार्यालय में हिमालय दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित संवाद कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि हिमालय का किसी राज्य व देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्व है। इसलिए इसके संरक्षण का दायित्व भी सभी का है। उन्होंने कहा कि हिमालय के बचाव के साथ व्यवहारिकता के पक्ष को भी ध्यान में रखना है। पहले आम आदमी की आजीविका वनों से जुड़ी थी, तब वन सुरक्षित थे। हमें पुन: आम आदमी को वनों से जोड़ना होगा। सरकार इस दिशा में काम कर रही है।
वन मंत्री ने कहा कि हमने इस बार पौधरोपण की नीति में बदलाव किया है। जंगल और इसके आसपास की खाली जमीन पर फलदार पौधे रोपे जा रहे हैं। कोशिश यह है कि छोटे जानवरों को जंगल में ही पर्याप्त भोजन मिल जाए। फिर वह आबादी क्षेत्र में नहीं आएंगे। इससे बड़े जंगली जानवरों का भी आबादी क्षेत्र में आना रुक जाएगा। इसके तहत हम लंबी अवधि की योजना पर काम कर रहे हैं।