सफलता के लिए विकलांगता कोई बाधा नहीं

जौनसार के डा. रितेश सिंह तोमर बने दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर।

देहरादून। रितेश तोमर बचपन से ही दृष्टि बाधित हैं। समय से उनके दादा जी एवं पिताजी ने उन्हें राष्ट्रीय दृष्टिबाधितार्थ संस्था देहरादून एनआईवीएच में पढ़ाई के लिए भेजा, इसका श्रेय दादाजी दीवान सिंह तोमर (सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक) की सहायक अध्यापिका जसवीर कौर निवासी राजपुर देहरादून को जाता है जिन्होंने एनआईवीएच के विषय में जानकारी दी। वहाँ से कक्षा 12वीं पास करने के बाद डाँ० रितेश ने दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए इतिहास एवं शिक्षा शास्त्र पास किया।

इसके पश्चात उन्होंने जेएनयू से शिक्षा शास्त्र में अपनी एम फिल एवं पीएचडी पूरी की। इतिहास एवं शिक्षा शास्त्र में एनईटी-जेआरएफ हासिल करने के बाद डाँ० रितेश ने दिल्ली विश्वविद्यालय में  संविदा पर असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर 2014 से कई कॉलेजों में इतिहास एवं सामाजिक अध्ययन विषय लगभग आठ वर्षों तक पढाया।

इसके बाद वर्ष 2023 में एशिया के विख्यात विश्वविद्यालय अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय बैंगलुरु में उन्हें अपनी योग्यता के बदौलत सेवाएँ  प्रदान करने का आमंत्रण मिला जहाँ पर डाँ० रितेश तोमर ने अपनी धर्म पत्नी डाँ0 पल्लवी ठाकुर के साथ असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय बैंगलुरु में सेवाएँ प्रदान करते हुए भोपाल स्थानान्तरण लिया।

डाँ० रितेश तोमर की काबिलियत का शायद दिल्ली विश्वविद्यालय को इंतजार था अतएव लम्बे समय बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के माता सुंदरी कॉलेज में उन्हें सहायक प्रोफ़ेसर के पद पर स्थायी नियुक्ति प्राप्त हुई। डाँ० रितेश तोमर अपनी सफलता का श्रेय अपने दादाजी दीवान सिंह तोमर, दादीजी, माता प्रमिला तोमर, अपनी पत्नी डाँ० पल्लवी एवं पिता आनंद सिंह तोमर एवं  ग्राम बांसू  ख़त लखवाड निवासी को देते हैं (जो सीआईएसएफ के निरीक्षक के पद से वीआरएस लेकर देहरादून में रहते हैं)।

यह जौनसार बावर के उन सभी युवकों के लिए प्रेरणा हैं जो सब कुछ सही होने के बाद भी अपने मार्ग से भटक जाते हैं। डाँ० रितेश तोमर बचपन से संगीत प्रेमी भी है जिन्होंने जौनसारी गढ़वाली हिमाचली के मुख्य गानों में बिसरे आपणे रीती रिवाज, गलवान घाटी व कोरोना को चेडो जैसे कई गानों अपनी मधुर आवाज़ से गाया है, डाँ० रितेश सिंह तोमर को उनके अग्रिम भविष्य के लिये ढेरों बधाईयाँ एवं शुभकामनायें।

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