मेजर जनरल (रि.) भुवन चंद्र खण्डूरी का प्रेरणादायी जीवन संघर्ष, अनुशासन और जनसेवा की अमिट गाथा।
देहरादून। उत्तराखंड और भारतीय राजनीति ने एक ऐसे जननेता को खो दिया, जिसकी पहचान केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्त सैनिक, अनुशासित प्रशासक, दूरदर्शी नेता और ईमानदार जनसेवक के रूप में रही। Bhuvan Chandra Khanduri का जीवन भारतीय लोकतंत्र और सैनिक परंपरा के उन मूल्यों का जीवंत उदाहरण था, जिनमें राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है।

1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में जन्मे भुवन चंद्र खण्डूरी ऐसे परिवार से जुड़े थे, जहां संस्कार, अनुशासन और शिक्षा को अत्यंत महत्व दिया जाता था। उनके पिता स्वर्गीय जय बल्लभ खण्डूरी और माता स्वर्गीय दुर्गा देवी खण्डूरी ने उन्हें सादगी, कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के संस्कार दिए। यही कारण रहा कि उनका पूरा सार्वजनिक जीवन साफ-सुथरी राजनीति और कठोर अनुशासन का प्रतीक बन गया।

प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने 1951 से 1953 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विज्ञान की पढ़ाई की। युवावस्था में ही उन्होंने तय कर लिया था कि उनका जीवन राष्ट्रसेवा को समर्पित रहेगा। इसी संकल्प के साथ उन्होंने भारतीय सेना का मार्ग चुना और 1954 में भारतीय सेना की कॉर्प्स ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन प्राप्त किया।
सेना में अनुशासन, साहस और नेतृत्व की मिसाल
सेना में रहते हुए भुवन चंद्र खण्डूरी ने केवल एक अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि एक रणनीतिक और दूरदर्शी सैन्य नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई। उन्होंने पुणे स्थित कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और आगे चलकर डिफेन्स सर्विसेज स्टाफ कॉलेज वेलिंगटन तथा इंग्लैंड के रिजर्व स्टाफ कॉलेज से उच्च सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया।

उनकी सैन्य यात्रा ऐसे समय में आगे बढ़ी जब भारत लगातार सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा था। वे 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 के भारत-पाक युद्ध और 1971 के ऐतिहासिक भारत-पाक युद्ध के सहभागी रहे।
विशेष रूप से 1971 के युद्ध में जम्मू-कश्मीर के सांबा सेक्टर में इंजीनियर रेजिमेंट के कमांडर के रूप में उन्होंने असाधारण नेतृत्व क्षमता दिखाई। युद्धकालीन कठिन परिस्थितियों में पुल निर्माण, सैन्य मार्ग तैयार करना और रणनीतिक सहायता जैसी जिम्मेदारियों को उन्होंने दक्षता से निभाया।
सेना में उनकी प्रशासनिक क्षमता भी बेहद मजबूत मानी जाती थी। उन्होंने आर्मी मुख्यालय में डायरेक्टर ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज़, इंजीनियर ब्रिगेड कमांडर, सिलीगुड़ी क्षेत्र के चीफ इंजीनियर तथा अतिरिक्त महानिदेशक जैसे कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया।
उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के सम्मान में भारत सरकार ने 26 जनवरी 1982 को उन्हें अति विशिष्ट सेवा मेडल (AVSM) से सम्मानित किया। लगभग साढ़े तीन दशक तक देशसेवा करने के बाद वे मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन राष्ट्रसेवा का उनका मिशन यहीं समाप्त नहीं हुआ।
राजनीति में ईमानदारी और साफ छवि की पहचान
सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। वर्ष 1991 में वे पहली बार गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए। जनता ने उनके अनुशासन, ईमानदारी और राष्ट्रवादी सोच को पसंद किया और वे लगातार कई बार संसद पहुंचे।

उन्होंने संसद में रक्षा, वित्त, गृह, पेट्रोलियम और लोक लेखा समितियों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे उन नेताओं में शामिल थे, जिनकी पहचान भाषणों से अधिक कार्यशैली और सादगी से होती थी।
उनकी राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह था कि उन्होंने कभी सत्ता को विशेषाधिकार नहीं माना, बल्कि सेवा का माध्यम समझा। यही कारण रहा कि विरोधी दलों के नेता भी उनकी साफ छवि और कार्यशैली का सम्मान करते थे।
भारत के सड़क विकास में ऐतिहासिक योगदान
जब भारत में आधुनिक सड़क नेटवर्क की कल्पना आकार ले रही थी, तब भुवन चंद्र खण्डूरी उस परिवर्तन के प्रमुख सूत्रधारों में शामिल थे।
7 नवम्बर 2000 को उन्हें भारत सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बनाया गया। बाद में वे केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री बने।
पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee के नेतृत्व में प्रारंभ हुई गोल्डन क्वाड्रिलेटरल परियोजना को गति देने में उनका अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान रहा। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता को जोड़ने वाला यह राष्ट्रीय राजमार्ग नेटवर्क भारत की आर्थिक प्रगति की नई धुरी बना।
उनकी कार्यशैली तेज निर्णय, पारदर्शिता और परिणामोन्मुख प्रशासन के लिए जानी जाती थी। यही कारण था कि उन्हें देश के सबसे प्रभावी मंत्रियों में गिना जाने लगा।
उत्तराखंड में अनुशासित प्रशासन की नई पहचान
उत्तराखंड राज्य की राजनीति में उनका कार्यकाल विशेष रूप से याद किया जाता है। 8 मार्च 2007 को उन्होंने पहली बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने प्रशासनिक अनुशासन, पारदर्शिता और वित्तीय सुधारों को प्राथमिकता दी। उनके कार्यकाल में सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ाने के प्रयास हुए। राज्य के वित्तीय प्रबंधन की राष्ट्रीय स्तर पर सराहना हुई और उत्तराखंड को 13वें वित्त आयोग से विशेष प्रशंसा मिली।
वर्ष 2008 में इंडिया टुडे द्वारा उन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्रियों में शामिल किया गया।
11 सितम्बर 2011 को वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। उनके दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी पहचान मजबूत लोकायुक्त कानून रहा। भ्रष्टाचार के खिलाफ उनके सख्त रुख ने उन्हें जनता के बीच एक ईमानदार और दृढ़ नेता के रूप में स्थापित किया।
समाजसेवा और सांस्कृतिक जुड़ाव
राजनीति और सेना के अतिरिक्त वे सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से भी गहराई से जुड़े रहे। वे पूर्व सैनिकों के हितों के लिए लगातार कार्य करते रहे और कई सामाजिक संगठनों से जुड़े रहे।
वे पर्वतीय संस्कृति परिषद, पूर्व सैनिक सेवा परिषद और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से समाजसेवा में सक्रिय रहे। उत्तराखंड की संस्कृति, युवाओं और सामाजिक मूल्यों के संरक्षण को लेकर वे हमेशा चिंतित रहते थे।
एक ऐसी विरासत जो पीढ़ियों को प्रेरित करेगी
मेजर जनरल (रि.) भुवन चंद्र खण्डूरी का जीवन केवल पदों और उपलब्धियों की सूची नहीं था। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, अनुशासन और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखकर भी सम्मान और लोकप्रियता प्राप्त की जा सकती है।
सैनिक, सांसद, केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और समाजसेवी—हर भूमिका में उन्होंने कर्तव्य को सर्वोच्च रखा। उत्तराखंड ही नहीं, पूरा देश उन्हें एक ऐसे जननेता के रूप में याद करेगा, जिसने सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया और अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
उनकी सादगी, स्पष्टवादिता और राष्ट्रनिष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।
सेवा भारत टाइम्स
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